कविता · Reading time: 1 minute

अतीत

अतीत में लुप्त कोई घङी
आज मस्तिष्क पटल पर पङी
ना सोच कर सोचता गया
सामने वो थी आ खङी ।

आँगन महक सा गया
दिल कुछ बहक सा गया
प्रीत की वो बातें दोहराई
वक्त कहीं ठहर सा गया ।

रुक्को रूकजाओ जाना नहीं
छोड़कर हमको जानां कहीं
चलो उन वादियों में फिर
तेरा मेरा ठिकाना वहीं

एक वादा किया था तुम से
एक वादा तुम्हारा हम से
सोच कर वो आँख भर आई
भूल हुई जो नादान हम थे।

देवेन्द्र दहिया – अम्बर
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