अतिथि

विधा-महाशृंगार छंद
अतिथि बनकर आये भगवान, करें हम अभिनंदन, गुणगान|
सुमन भावों का करती दान, नहीं इससे बढ़कर अनुदान |

पधारे हैं यहाँ मेहमान, बनाईं मीठा-सा पकवान|
सभी मिलजुल करिये जलपान, नहीं मन में रखियेअभिमान|
लगा लोंगा इलाइची पान, खड़े हैं स्वागत में श्रीमान|
अतिथि बनकर आये भगवान, करें हम अभिनंदन, गुणगान|

बड़ों का करते हैं सम्मान, सदा छोटों का रखते मान|
सजायें अधरों पर मुस्कान, हमेशा रखते सब का ध्यान|
आप से बढ़ी हमारी शान, लगे घर मेरा स्वर्ग समान|
अतिथि बनकर आये भगवान, करें हम अभिनंदन, गुणगान|

खुशी का मिला हमें वरदान, मिली गुणकारी ऐसा ज्ञान|
क्षमा हो भूल सभी अनजान, पधारें फिर से यह अरमान|
हुईं मैं धन्य आज धनवान, चरण का हरदम रहे निशान|
अतिथि बनकर आये भगवान,करें हम अभिनंदन, गुणगान|
लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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