May 2, 2017 · कविता
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अजीब सी जिंदगी

अजीब सी है ज़िंदगी, सफ़र तो है पर मुकाम नहीं
कभी उलझनों सी सुबह,कभी बदमिज़ाज सी शाम है

कहाँ अब प्रेम अपनत्व और रिश्तों में नरमी, अब ज़रूरतों का मिलना और राम राम है, या मतलब का सलाम है

हर कोई है मौके के यार, रिश्ते निभाना आसान कहाँ है
ढोंग छल और प्रपंच का तिलिस्म , रिश्तों में जान कहाँ है

कभी लगे धूप के गॉँव सा, कभी लगे शाम की छाँव सा
ज़रा इन रिश्तों से पूछना ये जरूरतों का राम राम है या मतलब का सलाम है

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रीतेश माधव
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