कविता · Reading time: 2 minutes

अजन्मी बेटी

शब्दों रूपी अँगारों में खौल रही हूँ
माँ मैं तेरी अजन्मी बेटी बोल रही हूँ ।।

माँ ऐसी क्या मजबूरी जो तू मुझको मार रही है
मेरे अरमानों की माला को कर तार-तार रही है
हरियाणा की बेटियां माँ कितना नाम कमा रही हैं
दुनिया के तानों को मैं एक तराजू में तोल रही हूँ ……..
माँ मैं तेरी अजन्मी बेटी बोल रही हूँ ।।

किसकी बातों में आकर ये गलत कदम उठाया है
क्यों नारी होकर नारी को मिटाने का बीड़ा उठाया है ।
नारी होकर नारी को क्यों इतना बेबस बनाया है
नारी के अस्तित्व पर मैं प्रहार की कड़िया खोल रही हूँ ……..
माँ मैं तेरी अजन्मी बेटी बोल रही हूँ ।।

बोझ समझकर न मुझको ऐसे मारो तुम
बन जाओ मेरी ताकत ऐसे हिम्मत न हारों तुम ।
नारी की शक्ति को माँ एक बार विचारों तुम
अपनी जिन्दगी को मैं तेरे आँचल में टटोल रही हूँ ……..
माँ मैं तेरी अजन्मी बेटी बोल रही हूँ ।।

बनी हूँ तेरे खून से कुछ तो सोच विचार करो
खुशियों से आँगन भर दूँगी कुछ तो उपकार करो ।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नारे को साकार करो
नारी की ऐसी दुर्दशा पर कर आज मखोल रही हूँ ……..
माँ मैं तेरी अजन्मी बेटी बोल रही हूँ ।।

ऐ! माँ जगा लो नरित्व को स्वार्थ का त्याग करो
मुझ अजन्मी को बचाने का भरसक प्रयास करो ।
देश की गौरव बेटियों का न ऐसे उपहास करो
माँ बेटी के रिश्तों में मैं अब मिश्री घोल रही हूँ ……..
माँ मैं तेरी अजन्मी बेटी बोल रही हूँ ।।

पूनम पांचाल
अंग्रेजी विभाग
राजकीय महाविद्यालय सफीदों
(जींद) हरियाणा

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