अजनबी

कहीं किसी दिन हम अचानक मिले,
बरसों पहले बिछड़े अजनबियों की तरह,
हाँ ! अजनबी ही तो थे हम,
कहाँ जानते थे,एक दूसरे के अनकहे जज्बात,
कहाँ समझते थे,एक दूसरे की मजबूरियाँ,
एक दूसरे के हालात,
यकीनन अजनबी थे जो इतने वर्षों साथ
रह कर भी दूर थे- कोसों दूर
प्रेम में जहाँ जुबान का काम ही नहीं,
सिर्फ ऑंखें ही समझती हैं , सारे ख्यालात,
वहाँ कहाँ समझ पाते थे हम, आँखों की भाषा,
मूक प्रेम की परिभाषा,
इसलिए तो अलग रहे चुंबकीय छोर की तरह,
आतुर करीब आने को,
पर कोई अनजानी शक्ति लगी रही,
सब कुछ बिखराने को,
प्रेम में लुटाते हैं लोग सर्वस्य ,
हम प्रेम में थे ही बिछड़ जाने को,
अंतहीन पीड़ा पाने को,वैमनस्य को अपनाने को,
संवेदनहीन हो जाने को,
संवेदनहीन हो जाने को………

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