अजनबी

अजनबी के साथ सफर में
हम सफर बनना कितना अच्छा लगता है
उस वक्त नहीं होती
कहीं उम्र
नहीं होता
कोई बन्धन
होता है तो बस
साथ चलते रहने का मन…

देखते रहने का
कहीं दूर
ऊँची पहाड़ियों को
देखते रहने का
उन पर से गिरते झरनों को
दूर बहती नदी को
या……
दूर-दूर तक
फैली रेत
उस पर चलते रहना
नंगें पैर…

चलने को
यूं ही मचल जाता है मन
फिर कहीं होती है झिझक
ये जो अजनबी है
सोचता क्या होगा….?
चाहे वो भी हो
मेरी तरह मस्ती में डूबा
उन ख्वाबों में
जिनको ये जागती आँखें देखती हैं……

सुनील पुष्करणा

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 17

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share