कविता · Reading time: 1 minute

अजनबी

अजनबी के साथ सफर में
हम सफर बनना कितना अच्छा लगता है
उस वक्त नहीं होती
कहीं उम्र
नहीं होता
कोई बन्धन
होता है तो बस
साथ चलते रहने का मन…

देखते रहने का
कहीं दूर
ऊँची पहाड़ियों को
देखते रहने का
उन पर से गिरते झरनों को
दूर बहती नदी को
या……
दूर-दूर तक
फैली रेत
उस पर चलते रहना
नंगें पैर…

चलने को
यूं ही मचल जाता है मन
फिर कहीं होती है झिझक
ये जो अजनबी है
सोचता क्या होगा….?
चाहे वो भी हो
मेरी तरह मस्ती में डूबा
उन ख्वाबों में
जिनको ये जागती आँखें देखती हैं……

सुनील पुष्करणा

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