अजनबी भीड़

सूनी आँखों से आकाश को निहारती विभा न जाने क्या सोच रही थी कि अचानक उसका अतीत किसी भयंकर भूकंप की तरह उसके शरीर को तरंगित कर गया। पल भर में ही वह किसी जलहीन मीन की भाँति तड़प उठी।वर्षों पूर्व गर्त में दबे अतीत का इस तरह अचानक उसके मानस पटल पर आना किसी तूफान से कम नहीं था। अतीत अतीत होता है वह परिवर्तित नहीं किया जा सकता किन्तु कई बार विभा का मन मस्तिष्क उस अतीत से आहत होकर उसे परिवर्तित करना चाहता है।

एक अजीब से झंझावात से गुजरते अतीत तक विभा आज पुन: पहुँच गयी। वो एक सुरम्य सी रमणीक जगह थी। सैलानी प्रकृति के मनोहारी दृश्य को निहार रहे थे और विभा अरुण को। कितना सौम्य व्यक्तित्व था अरुण का।स्नेह, औदार्य और मेधा का ऐसा सुन्दर सम्मिश्रण शायद ही कहीं दिखता हो।क्रोध तो जैसे देखा ही न हो। सूर्य सा तेज चेहरे से टपक रहा था और उस तेज में विभा पिघल रही थी। अपने पिघलते स्वरूप को समेटते हुये वह अरुण से कुछ कहना ही चाहती थी कि अचानक उसने देखा कि कुछ लोगों की भीड़ उनकी तरफ दौड़ी चली आ रही थी।कुछ सैलानी तेजी से वापस जाते दिखायी दिये।एक शोर और शोर के साथ उमड़ती भीड़। विभा ने अरुण का हाथ पकड़ा और भागने की कोशिश की। किन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। वह अनजान भीड़ अरूण पर टूट पड़ी। विभा को हाथ से छुड़ाकर दूर फेक दिया गया। उस शोर में विभा की आवाज कहीं खो गयी। उसकी आँखों के सामने ये कैसा दृश्य? वह काँप गयी। अरुण पुकार रहा था और कोई उसको बचाने वाला नहीं था। विभा ने हिम्मत जुटाकर अपने सिर के बहते रक्त को पोछते हुये खड़ी हुयी। आगे बढ़ी कि किसी ने कहा “मारो इसे”।वह और आगे बढ़ी। अरुण चारों तरफ से घिरा हुआ खून से लथपथ भीड़ के एक सैलाब से जूझ रहा था। विनती कर रहा था कि उसे छोड़ दिया जाए। किसी की आवाज आयी ,”क्यों छोड़ दूँ तुझे”? अरुण ने कहा ,”मेरी क्या गलती”? “मुझे मत मारो।” विभा भीड़ के पास पहुँची और अरुण को बचाने की कोशिश करने लगी। बोली, “अरे मेरे अरुण ने तुम लोगों का क्या बिगाड़ा है”? “छोड़ दो उसे”। अचानक भीड़ रुक गयी और उस भींड़ से एक आवाज आयी “अरुण”? “तुम्हारा नाम अरुण है”? “हाँ मेरे पति का नाम अरुण है। छोड़ दो इन्हे। हमारी कुछ दिन पहले ही शादी हुयी है और हम तो यहाँ घूमने आये थे। छोड़ दो इन्हें।” विभा बोली। भीड़ से आवाज आयी, “छोड़ दे इसको ये वो नहीं।” रक्तपिपासु वह भीड़ चली गयी। विभा का अरुण असंख्य घावों से छटपटा रहा था। नाक मुँह और मस्तिष्क से रक्त की धारा बह रही थी। विभा आवाज लगा रही थी कि कोई आकर सहायता करे किन्तु सन्नाटे के अतिरिक्त वहाँ कोई भी नहीं था। वही प्रकृति पल भर पहले कितनी सुन्दर दिख रही थी और अब कितनी विभत्स। न जाने कौन उस अपरिमित सौन्दर्य को छीन ले गया और क्यों? असहाय विभा अरुण को आवाज दे रही थी किन्तु उसकी आवाज मानो अरुण तक पहुँच ही नहीं रही थी और अस्पताल में 5 वर्ष बाद आज डाक्टर की आवाज विभा तक…

©डा·निधि श्रीवास्तव ‘सरोद’

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