May 13, 2017 · कविता
Reading time: 1 minute

अच्छे दिन

आएगें अच्छे दिन
ज़रा ठहरो तो सहीं
सपने होगें साकार
सपने सजाओं तो सही
अभी तो सत्ता का नशा है
होना तो अभी बाकी हैं
आएगें अच्छे दिन
ज़रा ठहरों तो सहीं
शासन की सत्ता-से
ऐसी छायी चुस्ती
इंसानों के सिर
नोंच रहे है कुत्ते
फिर भी कहते हैं
आएगें अच्छे दिन
ज़रा ठहरों तो सही
अच्छे दिन देने वाले
अच्छे दिन को नही समझते
महंगाई में छीपे जनता का
दर्द नहीं समझते
आएगे अच्छे दिन
ज़रा ठहरो तो सही
देश की गलियों में
सार्वजनिक सभाओ में
वादों की बरसातों से
बैठ गए संसद में
फिर भी कहते है-
आएगें अच्छे दिन
ज़रा ठहरों तो सही
बैठनें वाले बैठे हैं
घूमने वाले घूम-रहे हैं
बढनें वाले बढ-रहे हैं
गिरनें वाले गिर-रहे हैं
लड़ने वाले मर-रहे हैं
फिर भी कहते है-
आएगे अच्छे दिन
ज़रा ठहरों तो सहीं !
कहने की आदत नहीं
पर कह देता हूँ –
तुम जो कर रहे हैं
ये चल नही सकता
देश -सेवा से भरा
हृदय बदल नहीं सकता
अच्छे दिन , वादा है जनता-से
तुम इससे मूकर नही सकते
जन के मन-को ,जनता-से
तुम छल नहीं सकते !
आएगें अच्छे दिन
ज़रा ठहरों तो सही !!!

————×—————-×—————

2 Comments · 173 Views
Copy link to share
पता-महेशपुरा (कोटखावदा) जयपुर अध्यापक समसामयिक लेखक शिक्षा - NTT, BA ,BE.d MA (हिन्दी ) बडा... View full profile
You may also like: