अगर पूर्वजों के उतारे न होते .

अगर रंग – बिरंगे ये नारे न होते.
तो फिर हम भी इतने बेचारे न होते .
बस बातों के मरहम से भर जाते शायद .
अगर ज़ख्म दिल के करारे न होते .
भला किसकी हिम्मत सितम ढा सके यूँ .
अगर हम जो आदत बिगाड़े न होते .
यहाँ आबरू की ना होती तिजारत .
अगर आकाओं के सहारे न होते.
कथनी और करनी ज़ुदा गर न होती.
तो फिर वोट के लोग मारे न होते .
मिट जाती कब की ये रस्मोरिवाज़ें .
अगर पूर्वजों के उतारे न होते .
—- सतीश मापतपुरी

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