अकेले बैठतें हैं अब,जब भी कभी,

अकेले बैठतें हैं अब,जब भी कभी,
कुछ गजलें उतार देते हैं कागजों पर।
अनसुने हो गए जब दिल-ए-अरमान सभी,
खामोशियाँ उतार देते हैं कागजो पर,
अकेले बैठतें हैं अब,जब भी कभी,
कुछ गजलें उतार देते हैं कागजों पर।

जागती आँखों से जिन्हें देखने की भूल की,
अधूरे वो ख्वाब,उतार देते हैं कागजों पर।
सोचा था की,मिलेंगे तब केह देंगे,
वो हर बात,उतार देते हैं कागजों पर।
अकेले बैठतें हैं अब,जब भी कभी,
कुछ गजलें उतार देते हैं कागजों पर।

धुँधली हो गई मगर है जिन्दा ज़ेहन में ,
वो तेरी यादें,उतार देते हैं कागजो पर।
अकेले बैठतें हैं अब,जब भी कभी,
कुछ गजलें उतार देते हैं कागजों पर।
कुछ नज़्मे उतार देते हैं कागजों पर।

कपिल जैन

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