अकेलापन

न जोश मुझमें है, न हीं रंग
मुझमें है , मुझ हीं से है
अकेलापन~अकेलापन~अकेलापन !!

दूर तक फैला गम्भीर सा
“अर्श” को छूता, मुझसे होता
ज़िन्दगी का अंश~अकेलापन..!!

थकी आँखों में जवां चेहरा
कुछ पल लगता सब नया-नया
आगे नशे से जब बढे तो
लगे घोंटने दम धुप अँधेरा !!

लगता था हम साथ रहेंगें
नहीं खलेगा , अकेलापन
पर साया भी साथ है रहता
जब तक रहता उजाला संग !!

मिल हीं गया , जिसे न मिलना था
फिर वही जाना पहचाना
अकेलापन~अकेलापन~अकेलापन

……..अर्श

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