Feb 27, 2021 · कविता
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अंध आस्था और मायाजाल

मां, बापू और बाबा जी की ,
फैली लीला अपरम्पार है ।
तंत्र,मंत्र और जादू टोने का
ये सब इंद्रजाल है ।
सभ्य समाज में फैला,
अंध आस्था का मायाजाल है।
इसी अंध भक्ति से,
ये सब मालामाल है ।
कहत औरन से करो त्याग मोह माया, धन, सम्पत्ति का ,
तभी होत उद्दार है ।
उसी दान से झोली भरके ,
करते खुद के जीवन का उद्दार है ।
करत रंगमंच पर रासलीला और,
भक्तन संग झूला झूलत है।
रात्रि जागरण होता नाईट क्लबों में,
और भक्तन की गोदी में खेलत है ।
सत्ता की लोलुपता में ,
नेता-अभिनेता इनके चरण पडे़ है,
शासन के उच्चाधिकारी भी ,
अंध भक्ति में इनकी शरण गहे है ।
मां शब्द का कर अपमान,
कहती खुद को मां अवतारी है ।
फूहड़ नृत्य संगीत और परिधानों की,
ये कैसी लाचारी है ।
छल कपट के पायदान से,
कपटी बन बैठे संन्यासी है ।
संतों का वेश धरे ,
लालची, हत्यारे और व्याभिचारी है ।
कुछ ऐसे नकली बाबा,
करते धर्मात्माओं का अपमान है।
धर्म भक्ति को ओट में ,
चलाते अपनी दुकान है ।
बंद करो ऐसों की भक्ति,
जिनका धर्म का धंधा है।
शासन रोक सके न इनको,
क्योंकि यहां का कानून अंधा है।
जाग उठो सखा बंधु सब,
अब बेपर्दा इनको करना है। ।
बहुत हो गई मनमानी इनकी ,
अब तो इनको खदेड़ना है ।

डां. अखिलेश बघेल
दतिया (म.प्र.)

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Dr. Akhilesh Baghel
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