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अंदाज़

हर फूल का रंग जुदा है
हर शै का आगाज़ अलग है
किसी के मन तृष्णा व्यापे
कोई है ममता की खान
किसी की तिक्त कठोर है वाणी
किसी के मधुर रस की तान
काश सुस्वर छेड़े हर साज
मेरा सिर्फ है यह अंदाज

बाजे सभी के सुख के साज
बालक की सुनो किलकारी
तो वृदध जनों की पुकार सुनो
यदि हो तुम सेठ धनवान
तो दुखियों की गुहार सुनो
सुनो हर दिल की आवाज़
मेरा सिर्फ है यह अंदाज

नारी को क्यों करें प्रताड़ित
मंदिर प्रवेश क्यों वे शापित
यदि मंदिर अपवित्र हुआ
पुरुष नारी से न उत्पन्न हुआ
उसकी भी शुचिता पर प्रश्न है आज
हो सबके सुख का आगाज
मेरा सिर्फ है यह अंदाज

हर परिवार पुत्र अभिलाषी
कन्या भ्रूण हत्या करा दी
यदि कन्या यूं ही मारोगे
तो पुत्र किससे करेगा शादी
गर्त से बचाओ अपना समाज
मेरा सिर्फ है यह अंदाज

रिश्तों की गरिमा को भूला
न अपने पराये का लिहाज
दुधमुंही बच्चियों को न छोड़ा
रक्षक भक्षक बने हैं आज
अपनी संस्कृति पर धब्बे ये
रूके कुकृत्य ये है आवाज़
मेरा सिर्फ है यह अंदाज।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

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