कविता · Reading time: 1 minute

अंदर महक रही कस्तूरी

अंदर महक रही कस्तूरी, मैं बाहर ढूंढ रहा था
खुशियां भौतिक चीजों में, कबसे ढूंढ रहा था
पड़ी रही आत्मा उपेक्षित, पागल मन दौड़ रहा था
नई नई इच्छाऐं निशदिन, जीवन में ओढ़ रहा था
शिथिल हो गया शरीर, इंद्रियां नहीं भर पाईं थीं
अंतिम सांस तक अंतस में,झांक नहीं पाईं थीं
निकल गईं आत्मा शरीर से, अब पछतावा था
असली खुशियां अंदर थीं, मैं पहचान न पाया था

सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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