अंतर

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बचपन में जब छोटा था,
तो छोटी छोटी नासमझ आँखों से,
अक्सर देखता रहता था,
और अपरिपक्व अल्प बुद्धि से सोचता,
कि महलनुमा कोठियों के प्राँगण में,
ऊँची कुर्सियों पर विराजमान,
सफेद मखमली धोती कुर्ता परिधानों में,
लंबी मोटी मोटी मूंछ वाले के सामने,
नीचे वसुंधरा पर आसन जमाए हुए,
हाथ जोड़े हुए बेचारी सी सूरत बनाए,
फटी मैली सी मात्र धोती पहने अधनंगे से,
किसी मजबूरी में मजबूर से लोग कौन है,
दोनों वर्गों के पहरावे,दिखावे में ये कैसा अंतर,
पद सोपानों को वर्गीकृत करता ये कैसा मंत्र,
आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ,
शोषित और शोषक में बंट जाएं शाखाएँ,
शोषण की असीमित हद पार कर जाएं,
एक मानवीय रक्त जाति,धर्मों में बंट जाए,
खाने पीने के बर्तन तक बंट जाए,
और ऊँच नीच का भेद सा समझाएं,
ऐसे ऐसे दृश्य,परिदृश्य जो देखे थे,
उन्हे जब आज परिपक्वता के साथ,
मंथन,चिंतन करते हुए सोचता हूँ तो
व्यथित, विचलित हो जाता है बेबस मन,
मानवीय पीड़ा की टीस से हिलोरे खाता तन मन,
इस निर्णय पर आ कर स्थिर सा हो जाता है,
वो था दलित और स्वर्ण के बीच का अन्तर,
मनसीरत झूठा सा अप्रजातांत्रिक लोकतंत्र,
कुदरत नहीं बल्कि इंसानों का बनाया तंत्र…।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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