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अंतर्वेदना

Rita Singh

Rita Singh

कविता

September 22, 2016

बहुत रोई थी उस दिन मेरी संवेदना
जब मेरी माँ ने
मेरी होने वाली बहन को
उसके जन्म लेने से पहले ही
अपने गर्भाश्य की छोटी सी
दुनिया से निकाल
चिर् स्थाई नींद में सुला दिया था ।
मैं सपने संजोये बैठी थी
उस सचमुच की भावी गुड़िया के साथ
गुड़िया- गुड्डा खेलने के ।
मैंने अपने सभी खिलौनों में से
कुछ प्रिय खिलौने उसके लिए
अलग निकाल कर रख दिए थे ,
जैसे वो ढम ढम करता हुआ बंदर,
हाथ ऊपर उठाकर नाचता हुआ भालू ,
छोट-छोटे बर्तनों वाला किचन सैट…।
किंतु ये क्या !
मुझे असीम प्यार देने वाली
मेरी माँ ने ही
पारंपरिक अंधविश्वासयुक्त महत्वाकांक्षा के आगे
मेरी संवेदनाओं और
पूरे होने जा रहे
भावी सपनों को
यूँ ही टूटने और बिखरने दिया ।

डॉ रीता
आया नगर,नई दिल्ली- 47

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Author
Rita Singh
नाम - डॉ रीता जन्मतिथि - 20 जुलाई शिक्षा- पी एच डी (राजनीति विज्ञान) आवासीय पता - एफ -11 , फेज़ - 6 , आया नगर , नई दिल्ली- 110047 आत्मकथ्य - इस भौतिकवादी युग में मानवीय मूल्यों को सनातन... Read more

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