अंतर्मन में जब बलवा हो जाता है

अंतर्मन में जब बलवा हो जाता है
रो लेता हूँ मन हल्का हो जाता है

कैरम की गोटी सा जीवन है मेरा
रानी लेते ही ग़च्चा हो जाता है

रोज़ बचाता हूँ इज्ज़त की चौकी मैं
रोज़ मगर इस पर हमला हो जाता है

कैसे कह दूँ अक्सर अपने हाथों से
करता हूँ ऐसा, वैसा हो जाता है

पीछे कहता रहता है क्या-क्या मुझको
मेरे आगे जो गूंगा हो जाता है

उसकी शख्सियत में मक़नातीस है क्या
जो उससे मिलता उसका हो जाता है

उस दम महँगी पड़ती है तेरी आदत
सारा आलम जब सस्ता हो जाता है

ठीक कहा था इक दिन पीरो-मुर्शिद ने
धीरे-धीरे सब अच्छा हो जाता है
नज़ीर नज़र

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