कविता · Reading time: 1 minute

अंग दान

सुन ऐ मेरे अभिन्न अंग,लिया था जन्म मेंने तुमको भी साथ लेकर संग ,
सुन ऐ मेरे अभिन अंग,किया था पोषित तुमको भी माँ ने
किया था पल्लवित तुमको भी पिता ने,एक दूजे के संग संग,सुन ऐ मेरे अभिन अंग
दी थी माँ ने अमूल्य शिक्षा,देखा मुझ में अपना प्रतिरूप
करवाया था पाठ याद एकलव्य का,समर्पण व त्याग के महत्व का
किया समर्पित अभिन अंग गुरु दक्षिणा में
किंचित भी ना घबराया ना सकुचाया था,
कितना भाग्यशाली था वो अंग रख दिया उसे चरण पादुका संग ।।
सुन ऐ मेरे अभिन अंग ,तू भी रह मेरे पिया के संग
अब तक थी में उनकी जीवन साथी
तेरे कारण बन पाई में उनके नव जीवन की में नव दात्री
पिया ने जीती जंग जीवन की
पिया ने जीती जंग जीवन की
रक्षा की तुमने मेरे सतीत्व की
रक्षा की तुमने मेरे सतीत्व की
सुन ऐ मेरे अभिन अंग (kidine )…सुन ऐ मेरे अभिन अंग

सारांश…एक पत्नी अपने पति को अंग दान(kidney)करके स्वयम को कितना भाग्यशाली समझती हे…इस विषय पर मेंने ये कविता लिखी हॆ ये विश्व की पहली कविता हॆ जो गुर्दे पर लिखी गई हे ॥

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