" अंकल जी "

एक अंजाने राह पर ,
तुम्हें ऐसे मुलाकात हुई ।
ना जाने हृदय में कितनी बातें थीं ,
पल भर में नए मंजिल से मुलाकात हुई ।।

कह कर तुम्हें अंकल जी चिढ़ाती थी ,
तुम्हारी हर बात पर मैं चुपके से मुस्कुराती थी ।
हमेशा से तुम्हारी नाक मुझे बहुत भाती थी ,
कई बात सुनकर तुम्हारी मैं भड़क जाती थी ,
कभी कभी कई बातों पर तुम्हें समझाती थी ।।

तुम्हें तो किसी और की तलाश ही थी ,
ना जाने कैसे तुमने मुझे उसकी उपाधि दी ।
तुमने किसी और की कल्पना में ,
मेरी सुरत हृदय में अपने बसाई थी ।।

तुमने मेरे हृदय में कोई जगह नहीं बनाई थी ,
क्योंकि मेरे मन में बहुत ही शक की गुंजाइश थी ।
ये एकतरफा प्यार की गरमाइस थी ,
जो तुम्हारे आंखों में मुझे नज़र आयी थी ।।

मैं बहुत ही घबराई थी ,
ना जाने मैं किस मोड़ पर आयी थी ।
तुम्हारी बातों में ना जाने कितनी सच्चाई थी ,
कुछ पल के लिए मैं भी भावनाओं में बह आई थी ।।

मैं अपने हृदय में ना जाने कब तुम्हें बसा पाऊंगी ,
ये रिश्ता मैं कैसे निभा पाऊंगी ।
क्योंकि ये प्यार है क्या ?
लिख कर ज्यादा कुछ ना समझा पाऊंगी ।।

हो सके तो मेरे हालात समझ लेना ,
बीन बोले मेरे जज़्बात समझ लेना ।
मेरे लिखे कुछ शब्दों से मेरे हृदय का हाल समझ लेना ,
हो सके तो मेरा ये निस्वार्थ प्यार समझ लेना ।।

बातों बातों में मैं तुम्हें बहुत कुछ कह आयी थी ,
कभी अपशब्द कहे तो कभी स्वार्थी कह आयी थी ।
थोड़ी नादान हूं ना , इसलिए तुम्हारे हृदय का हाल मैं कभी समझ ना पाई थी ।।

तुमने हर वक्त अपनी मर्यादा निभाई थी ,
तुम्हारे जीवन की यही सच्चाई थी ।
आई.ए.एस. बनने का जो सपना तुमने सजाई थी ,
हे अंजनी ! पुरी हो तुम्हारी हर ख्वाइश भी ।।

( 20 अप्रैल – ये कविता एक ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन के अवसर पर उसे समर्पित है जिससे मेरा रिश्ता क्या है पता नहीं । सिर्फ वो सहपाठी थे कुछ घंटों की मुलाकात थी और थोड़ी हुई बात थी । जिसके नाम के अलावा ज्यादा कुछ मुझे मालूम नहीं । )

🙏 धन्यवाद 🙏

✍️ ज्योति ✍️
नई दिल्ली

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