कविता · Reading time: 1 minute

{¶【●मैं ग़ैरों का दुःख फिर भी बंटा रहा हूँ●】¶}

पता है के मै लूटा जा रहा हूँ।
बाद इसके भी दोस्ती निभा रहा हूँ।
कहीं पाता हूँ ख़ुद को ग़लत
कहीं यारों को ग़लत पा रहा हूँ।
डूबनी है नाव किसी दिन मझदार मे फँसकर,
फिर भी होकर बेख़बर इसे चला रहा हूँ।
अंजान हैं सभी सफ़र मे
नही कोई किसी का शहर में,
कोई मुझको भी कह सके अपना,
इक़ इसी आस में तालुकात सबसे बढ़ा रहा हूँ।
पाने को है बहोत कुछ पर
खोने को कुछ नही,
ज़िंदगी मुझसे मैं ज़िन्दगी से ख़ुश नही।
गिर न जाए कोई दीवार रिश्तों की,
हस्ती इसलिए सबके आगे झुका रहा हूँ।
मैं कद से ऊँचा नही हद से
बड़ा होना चाहता हूँ,
किसी और के नही अपने
पैरों पे खड़ा होना चाहता हूँ।
शायद इसलिए कितनों के
आँखों को मैं खटा रहा हूँ।
मुझे तो तमाम दुःखों के घेरे घेरे हैं,
मैं ग़ैरों का दुःख फिर भी बटा रहा हूँ।

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समाजहित में लिखना ही मेरा धर्म है और मैं आशा करता हूँ कि मेरे द्वारा रचित कविताएँ सभी पाठकों को पसन्द आएँगी तथा उनके जीवन को एक सही मार्ग की…
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