¤¤¤ जैहिंद के दोहे ¤¤¤

जैहिंद के दोहे —

होई मुग्ध जग सगरी, देखि सुधर तन-रूप ।
होंठ बिचकाए दुनिया, मुखड़ा देखि कुरूप ।।

देखे सूरत लोगवा, _लखे न सीरत कोय ।
जे देखे सीरत जदी, दुख काहे के होय ।।

रश्मि ले नीलम चमके, चमके गोरी-रूप ।
झूम उठे सारा जगत, पाकर दिनकर-धूप ।।

एक कारज एक समय, ना करियो दो-चार ।
एक लक्ष्य पे रहियो, _ पइहों कबहुँ न हार ।।

पगलाय पाई कुरसी, अँखियाँ मूँदी सोय ।
भाँड़ में गइलैं जनता, _ मंतरी चाँदी होय ।।

जग में दो बहु-रूपिये, बदले रूप हजार ।
एक हँसाय दुनिया को, _ एक ठगय संसार ।।

सेवक हमहिं कह-कह के, बनै प्रभु श्रीराम ।
कौनो सुविधा आप लैं, __ पीछे जनता नाम ।।

भाँत-भाँत अणु-रूप है, चौतरफा है छूट ।
चख ले तू जे मन धरे, __ मन में आवे लूट ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
06. 10. 2017

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