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“हम चलते रहे”

Dr.Nidhi Srivastava

Dr.Nidhi Srivastava

कविता

March 25, 2017

कितने ठहराव रहे जिन्दगी के
मगर हम चलते रहे।
देख साहिल दूर से
हम भँवर में मचलते रहे।
कितने खामोश किस्से रेत बन
आँखों में किरकिरी सी उड़ते रहे।
वक्त को फिसलते देख
हम हाथ मलते ही रहे।
कितने अरमान फलक पर
तारों के साथ टूटते रहे।

…निधि…

Author
Dr.Nidhi Srivastava
"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
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