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“शहीद का दर्द”

Vivek Kapoor

Vivek Kapoor

कविता

August 15, 2017

आज फिर हुई भारत की मिट्टी लहू लुहान है
खो दिए भारत ने आज फिर से कई जवान है
कौन जवाब देगा जो सनाटा है गांव की गलियों का
शोर सुनाई देता है सिर्फ उन बंदूको की नलियो का
गर्व है शहादत पे लेकिन अंदर से पिता वह टूट गया
इस बुढ़ापे का सबसे बड़ा सहारा जाने क्यों छूट गया
इंतज़ार करते करते उस माँ की आँखे हुई है फिर नम
कैसे बताऊँ कैसे छुपाऊँ जो है अब ज़िन्दगी भर का गम
टूट गयी है जो कल तक खनकती थी चूड़िया
कैसे मिट पाएंगी जो हुई है अब इतनी दूरियाँ
किसको अब छोटी बेटी पापा कह के बुलायेगी
देखेगी जब भी फोटो तोह याद बहुत ही आएगी
कौन जवाब देगा जो सनाटा है गांव की गलियों का
शोर सुनाई देता है सिर्फ उन बंदूको की नलियो का
फिर अब से टीवी पर बहुत इस हिंसा की निंदा होगी
लेकिन न जाने कहाँ से मानवता फिर से जिन्दा होगी
गोली किसी को भी लगे मरती हमेशा मानवता ही है
हिंसा तोह हमेशा से संसार में बढ़ाती दानवता ही है
न जाने क्यों हिंसा में लगा हुआ आज का इंसान है
फिर लेकिन बातचीत ही हर समस्या का समाधान है
– विवेक कपूर

Author
Vivek Kapoor
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