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व्यथित पर्यावरण

सुनील पुष्करणा

सुनील पुष्करणा "कान्त"

कविता

April 9, 2017

व्यथित पर्यावरण

अंगार चण्ड निदाघ ताप
धिक् मानव किया तूने प्रकृति का सत्यानाश

भू-स्खलन,पर्वत स्खलन,मृदा अपर दन
परितंत्र का क्षरण, प्रदूषण का प्रभंजन

नगाधिराज हतप्रभ निस्तब्ध
ग्लानि नहीं तुमको लेशमात्र

भागीरथी उर्मि को लगा आघात
औधोगिक अपशिष्ट, दूषित जल का वज्रपात

नगरीकरण का दानव,जनसंख्या का प्रकोप
शस्य श्यामल,अमूल्य वन सम्पदा,
हिमानी प्रपात का विलोप

प्रकृति आकुल संत्रस्त न्यून हुआ विहगों का
कलरव
विकरण, वैश्विक तापीकरण का विचित्र तांडव

अतिवृष्टि, अनावृष्टि, का असंतुलन, आपदा निमंत्रण
वन क्षरण, अरण्य रुदन कम्पित वृन्त वर्ण

संसृति संतप्त है, सर्वत्र प्रलय दृष्टगत है
जागृत हो मानव पर्यावरण जीवन कवच है

पुकारता रत्नाकर,अवनि,अम्बर,तल हिमकर
मानव तुम प्रवर, बुद्धि तुम्हारी प्रखर

करो कदम अग्रसर, पाट दो विध्वंसक विवर
स्वछंद विचरण करे प्रकृति, यही मौलिक कलेवर

सुनील पुष्करणा

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