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वो बेटियाँ ही हैं

satguru premi

satguru premi

कविता

January 16, 2017

वो बेटियाँ ही हैं हमें जीना सिखातीं ।
जिन्दगी-मौत के संघर्ष में,
पल रहीं कांटों के मध्य हर्ष में,
तीब्र गति से लक्ष्य पर वो बढ़ रहीं हैं,
कामयाबी के शिखर पर चढ़ रहीं हैं,
है धरा दलदल,नहीं पर लड़खड़ातीं ।
वो बेटियाँ ही हैं हमें जीना सिखातीं ।।
लाजवन्ती सी लिए सम्मान को,
पी रहीं हैं विश्व के अपमान को,
शीलता शालीनता से जी रहीं हैं,
घाव गहरे हो गए हैं,सी रहीं हैं,
टीश है मन में भरी,पर खिलखिलातीं ।
वो बेटियाँ ही हैं हमें जीना सिखातीं ।।
खुद समाहित हो रहीं हैं काल को,
रोंकती उर में बसे भूचाल को,
देख अपनी वेदना को पढ़ रहीं हैं,
विश्व के इतिहास को वो गढ़ रहीं हैं,
आस का अहसास लेकर मुस्करातीं ।
वो बेटियाँ ही हैं हमें जीना सिखातीं ।।
सह रहीं हैं आज अत्याचार को,
चाहतीं हैं अपने उद्धार को,
रोक सकतीं जुल्म,पर वो मौन हैं,
देखतीं,मेरे हितैषी कौन हैं,
जल रहीं हैं,पर नहीं प्रेमी जलातीं ।
वो बेटियाँ ही हैं हमें जीना सिखातीं ।।

सतगुरु प्रेमी
मो०-9721750511

Author
satguru premi
मैं सतगुरु प्रेमी बेसिक शिक्षा परिषद् द्वारा अध्यापक हूँ, गीत,गजल,छन्द और कविताएँ लिखने का प्रयास करता हूँ,पत्र,पत्रिकाओ में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रहतीं हैं , सारंधा की आन, प्रेमी विरह, छाया ' प्रकाशित कृतियाँ हैं।
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