Skip to content

यह नगरी है (४)

ईश्वर दयाल गोस्वामी

ईश्वर दयाल गोस्वामी

कविता

April 9, 2017

यह नगरी है ,
भक्तों की , परम विरक्तों की ।
बगुले जैसा ध्यान लगाते​ ।
फिर भी मछली पकड़ न पाते ।
यज्ञ कराते भजन कराते ।
रामायण का पाठ कराते ।
हज़ करते रोजा रखते हैं ।
व्रत रखते कीर्तन गाते है ।
थोड़ी-बहुत मदद भी करते ।
उसका सब पर रौब़ जमाते ।
यद्यपि अकर्मण्य हैं यह सब ,
फिर भी कर्मवीर कहलाते ।
केवल शोषण ही करते हैं ,
फिर भी ये पोषक कहलाते ।
परधन की ही बाट जोहते ,
स्त्रियों के आसक्तों की ।
यह नगरी है ,
भक्तों की परम विरक्तों की ।

Author
ईश्वर दयाल गोस्वामी
-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02 - 1971 जन्म-स्थान - रहली स्थायी पता- ग्राम पोस्ट-छिरारी,तहसील-. रहली जिला-सागर (मध्य-प्रदेश) पिन-कोड- 470-227 मोवा.नंबर-08463884927 हिन्दीबुंदेली मे गत 25वर्ष से काव्य रचना । कविताएँ समाचार... Read more
Recommended Posts
यह नगरी है (३)
यह नगरी है , संतों की , परम महंतों की । जटा-जूट लम्बे-चौड़े हैं । पर विचार इनके भौंड़े हैं । तिलक है लम्बा चिंतन... Read more
मुस्कुराने वालोँ से सब प्यार करते हैँ
जले दिल को जलाने की तमन्ना हम नहीँ रखते किसी को आजमाने की तमन्ना हम नहीँ रखते सुना है मुस्कुराने वालोँ से सब प्यार करते... Read more
मुस्कुराने वालोँ से सब प्यार करते हैँ
जले दिल को जलाने की तमन्ना हम नहीँ रखते किसी को आजमाने की तमन्ना हम नहीँ रखते सुना है मुस्कुराने वालोँ से सब प्यार करते... Read more
भगवान
"भगवान" भूमि गगन वायु अग्नि नीर इन पांच तत्तवों से मिलकर बनता है "भगवान" अर्थात हम सब "भगवान" हैं... परन्तु अपने कर्मोँ के अनुसार कहलाते... Read more