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मातृ नमन जननी नमन ।

drpraveen srivastava

drpraveen srivastava

कविता

September 3, 2017

मातृ नमन -जननी नमन

माँ बनने का अहसास अलग होता है ,
नव जीवन का अहसास अलग होता है ,
उदर मे पल रही संतान का सुख अलग होता है ।
आंचल की धार का अंदाज अलग होता है ।

माँ की धड़कन शिशु का अनहद नाद होती है ,
शिशु की हलचल माँ का प्राण होती है ।
जीवन का संचार, माँ की ममता का विस्तार यहीं होता है
माँ के आंचल मे जब दुग्ध सृजित होता है ।

शिशु का रुदन हो या कलरव ,
माँ को ये अहसास होता है ।
शिशु तो माँ के साये मे बड़ा होता है ,
शिशु की हर कला से वाकिफ माँ ,
लाड़ किया करती है , शिशु के असुरक्षित होते ही ,
भूखी शेरनी का रूप हुआ करती है ।

माँ के आंचल का विस्तार असीम होता है ।
क्षितिज के उस पार भी , माँ का अहसास होता है

हर रूप, हर रंग, हर ऋचाओ मे ,
हर भाषा, , हर प्रथा, हर धार्मिक मान्यताओं मे ,
हर सृजन, हर कृति और विधाओ मे,
ममता मयी माँ का स्वरूप दिखाई देता है ।

माँ कालजयी , सार्वकालिक , अंतर्यामी हुआ करती है ,
तभी तो उदास बचपन , समस्या ग्रस्त लड़कपन ,
परेशान हैरान बेटा , सबकी समस्याओ का निदान हुआ करती है।

उसके आशीष , उसकी सांत्वना मे
जीवन की हर आशा झलकती है,
माँ के आशा- विश्वास से जीवन सुदृढ़बनता है ।
पुत्र का जीवन सजग ,सुंदर सरल बनता है।

माँ कभी कुमाता नहीं होती
नहीं तो कुंती कर्ण की भी माँ नहीं होती
सामाजिक विषमता , लोकलाज का भय
भले ही आड़े आए पर, माँ तो ममता का स्वरूप हुआ करती है।

माँ तो माँ का ही रूप हुआ करती है ।

डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

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