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बेशरम

विजय कुमार नामदेव

विजय कुमार नामदेव

कविता

January 13, 2017

दिल ही है बेशर्म या दिलदार बेशरम।
करना नही है प्यार का व्यापार बेशरम।।

लड़ने पे है अमादा तो लड़ता नही क्योकर।
क्यों डर के भाग जाता है हर बार बेशरम।।

हर वक्त मुझसे चाहता लब चूमता रहूँ।
मुझसे भी ज्यादा लगता मेरा यार बेशरम।।

यह बात अलग है कि अभी कुछ नही हूँ मैं।
ढूंढेगा मुझको एक दिन संसार बेशरम।।

इसको ही मेरी दोस्तों तुम सल्तनत कहो।
लिखे है मैंने शे’र जो दो चार बेशरम।।

Author
विजय कुमार नामदेव
सम्प्रति-अध्यापक शासकीय हाई स्कूल खैरुआ प्रकाशित कृतियां- गधा परेशान है, तृप्ति के तिनके, ख्वाब शशि के, मेरी तुम संपर्क- प्रतिभा कॉलोनी गाडरवारा मप्र चलित वार्ता- 09424750038
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