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बेटियां

yogesh dhyani

yogesh dhyani

कविता

January 18, 2017

गहरे दरिया से लेकर वो
ऊंचे अम्बर चूम रहीं
हो सहरा की गर्म रेत या
जंगल पर्वत घूम रहीं

उनने अपनी हिम्मत से ही
लांघी कठिन दिवारे हैं
सदी पे उनका नाम लिखा है
मुट्ठी मे सब तारे हैं

बोझ नही वो आज किसी पर
सारे धर्म निभाती हैं
आज बेटियां गर्व बाप का
बूढ़ापे की लाठी हैं

योगेश ध्यानी

Author
yogesh dhyani
हिंदी साहित्य मे रूचि विशेष तौर पर काव्य के क्षेत्र मे । पेशे से मरीन इंजिनियर ।करीब 15 साल से निजी लेखन मे सक्रिय ।
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