.
Skip to content

बेटियाँ

अमरेश गौतम

अमरेश गौतम

कविता

January 10, 2017

बेटियाँ कच्चे बाँस की तरह,
पनपती आधार हैं।
बेटियाँ ही अनवरत,
प्रकृति की सृजनहार हैं।

किसी भी संदेह में ना,
उन्हें मारा जाय।
उनको भी स्नेह की,
छाँव में दुलारा जाय।

इनसे ही श्रृगार धरा का,
इनसे ही भूमि पावन।
जगत जननी अयुज बेटियाँ,
इन्हें करें सौ बार नमन।

समानता को संकल्प बना,
आगे इनको बढ़ाया जाय।
भूल रूढ़ियाँ सभी चलो,
हर बेटी को पढ़ाया जाय।

Author
अमरेश गौतम
कवि/पात्रोपाधि अभियन्ता
Recommended Posts
आस!
चाँद को चांदनी की आस धरा को नभ की आस दिन को रात की आस अंधेरे को उजाले की आस पंछी को चलने की आस... Read more
आहिस्ता आहिस्ता!
वो कड़कती धूप, वो घना कोहरा, वो घनघोर बारिश, और आयी बसंत बहार जिंदगी के सारे ऋतू तेरे अहसासात को समेटे तुझे पहलुओं में लपेटे... Read more
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है मगर छन भी आती कहीं रोशनी है न करती लबों से वो शिकवा शिकायत मगर बात नज़रों से... Read more
मुक्तक
होते ही शाम तेरी प्यास चली आती है! मेरे ख्यालों में बदहवास चली आती है! उस वक्त टकराता हूँ गम की दीवारों से, जब भी... Read more