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फिर मिलेंगे

राहत वसीम

राहत वसीम

लेख

April 17, 2017

आऊंगा फिर कभी तेरी ओर
अपने साथ लेके एक नई पहचान
अभी चलता हूं फिर मिलेंगें
कुछ है साथ यादों का समंदर
कुछ यादों की नदियां छोड़ जाता हूं
कभी तो कहीं तो नदियां समंदर से
फिर मिलेंगे
अच्छा चलता हूं फिर मिलेंगे
वक़्त जो गुजारे थे साथ थोड़ा रख लेता हूं
चंद बातों को भी रख लेता हूं
महसूस होगा कभी अकेलापन तो
इन्हें याद कर लूँगा
ये लम्हे फिर कहाँ मिलेंगे
चलो चलता हूं फिर मिलेंगे
मुसाफिर हु राह चलने की आदत है
चलते चलते फिर कभी आऊंगा तेरे शहर की ओर
कभी तो किसी चौराहे से तेरे शहर के रास्ते
फिर मिलेंगे
अब चलता हूं फिर मिलेंगे

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