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तुमको ढूँढूं मैं कहाँ अरे, तुम सारी दुनिया से हो परे!

Anurag Dixit

Anurag Dixit

कविता

September 13, 2017

तुमको ढूँढूं मैं कहाँ अरे,
तुम सारी दुनिया से हो परे!
फूलों फलियों और कलियों में,
सब सब में हैं तुम्हारे रंग भरे,
तुमको ढूँढूं मैं कहाँ अरे,
हर नर के और हर नारी के,
सज्जन के या व्यभिचारी के,
सब के ही तुमने कष्ट हरे,
तुमको ढूँढू मैं कहाँ अरे,
तुम सारी दुनिया से हो परे!
पवन में और अपावना में,
नूतन में और पुरातन में,
सब में तुमने निज अंश भरे
तुमको ढूँढू मैं कहाँ अरे,
तुम सारी दुनिया से हो परे!
निज स्वर्ग और निज वसुधा में,
गोकुल में बृज में मथुरा में
संपूर्ण विश्व में पग हैं धरे
तुमको ढूँढू मैं कहाँ अरे,
तुम सारी दुनिया से हो परे!
निज गृह में बन में जीवन में,
कोमल और शान्तिशील मन में
सब में हो रमे और बिखरे
तुमको ढूँढू मैं कहाँ अरे,
तुम सारी दुनिया से हो परे!
कोलाहल में नीरवता में
क्रोधानल या धीरजता में
सब में हैं तुम्हारे भाव भरे
तुमको ढूँढू मैं कहाँ अरे,
तुम सारी दुनिया से हो परे!

Author
Anurag Dixit
मेरा जन्म फर्रुखाबाद के कमालगंज ब्लॉक के ग्राम कंझाना में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ,मैंने वनस्पति विज्ञानं में एमएससी,ऍम.ए. समाजशाह्स्त्र एवं एडवरटाइजिंग पब्लिक रिलेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया,व जन स्वास्थ्य में,परास्नातक डिप्लोमा किया, विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशन एवं... Read more
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