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जिंदगी एक खुली किताब

drpraveen srivastava

drpraveen srivastava

कहानी

September 15, 2017

जिन्दगी एक खुली किताबः

यह कथानक एक ऐसे ईमानदार डाक्टर की कहानी हैं, जिसने अपने कर्तव्य के लिये परिवारिक हितों को अनदेखा कर अपनी जान तक खतरे में डाल दी। परन्तु अपनी सूझबूझ से हर समस्या हर कठिनाई का हल निकाला व अपनी जिन्दगी अपनी तरीके से जीने की कोशिश में कामयाबी हासिल की।
डा0 श्याम एक कामयाब चिकित्सक थे। चिकित्सा के संसार में उनका बड़ा नाम था। चिकित्सा विज्ञान मंे कामयाबी उनके कदम चूम रही थी। वे निरन्तर अध्ययनशील रहते थे। उनमे विज्ञान के प्रति अगाध रूची थी। खान-पान से लेकर जीवनशैली तक उनकी वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित थी। हर क्रिया कलाप को वैज्ञानिक तर्क हासिल था। विज्ञान एवं ज्ञान के प्रति अनूठी निष्ठा बहुत कम ही देखनेे को मिलती हैं। उन्होने प्रत्येक व्यक्ति की जीवन शैली को चिकित्सा विज्ञान के स्तर से परखा एवं उसमे सुधार का पक्ष रखा। खान-पान की बिगड़ी अवैज्ञानिक रितियों का विरोध एवं उसमे स्वच्छता एवं कैलोरी युक्त भोजन का समावेश उनका अभिनव प्रयास था। जिसे घर-घर में सराहा गया। चिकित्सक विज्ञान के प्रति समर्पण एवं तार्किक निदान एवं शोध की जिज्ञासा उनकी लोकप्रियता का मानक बनी। उत्तर प्रदेश के लखनऊ मण्डल के छोटेे से जनपद हरदोई में उनका निवास स्थान था। मुख्य सड़क महात्मा गंाधी मार्ग को जुड़ने वाली उनकी घर तक जाने वाली गली डाक्टर साहब की गली के नाम से प्रसिद्ध हुयी। डा0 श्याम की पत्नी एक शालीन खूबसूरत शिक्षित संस्कारी महिला थी तथा पेशे से वे एक ईमानदार योग्य शिक्षिका थी। और उन्होने अपने कार्यकाल में शिक्षा के गिरते स्तर को ऊंचा उठाने के लिये प्रशसंनीय प्रयास किया। डा0 श्याम का एक सुन्दर मेधावी संस्कारी पुत्र था। डाक्टर साहब ने बचपन से ही उसके जीवन को विज्ञान के दिशा में निर्देशित किया था। विज्ञान एवं ज्ञान का संगम पुत्र को विनम्र जिज्ञासु एवं योग्य बना गया।
डा0 श्याम की राह कठिन थी। सरकारी नौकरी में रहते हुये सरकारी जीवन दर्शन एवं परिवारिक जीवन दर्शन में घाल-मेल होने लगा। इस कारण सरकारी नौकरी का दायित्व उनके जीवन पर छा गया व उनके पारिवारिक जीवन को भी प्रभावित किया। पारिवारिक जीवन के लिये उनका समय कम होने लगा उससे पारिवारिक कटुता एवं क्लेश का संचार हुआ। अनकी धर्म पत्नी एवं पुत्र में असंतोष की लहर उठने लगी । इस कारण कभी-कभी पति-पत्नी में झगड़ा भी होने लगा। जिसका प्रभाव मासूम हृदय बच्चे पर भी पड़ता था। वह अक्सर बुझा-बुझा उदास रहने लगा। डाक्टर साहब के उत्तर दायित्व निर्वान्ह् एवं ईमानदारी ने समाज के रोगियों एवं पीड़ितों का निःशुल्क उपचार तो किया परन्तु पारिवारिक उत्तर दायित्व के निर्वान्ह मे कही चूक होने लगी। पुत्र की आवश्यकताओं और पत्नी की आवश्यकताओें में समझौता होने लगा। इससे बच्चे और पत्नी ने एक समझौता कर आर्दशवाद को अपना लिया, जिसके कारण इस अर्थ युग में अर्थ का महत्व केवल खान-पान एवं पहनने ओढ़ने तक ही सीमित हो गया। सारा परिवार एक समझौते के अन्तर्गत आदर्शवाद की भेंट हो गया।
यथार्थ से हटकर धन की चमक से दूर ऐश्वर्य की चका-चैंध से दूर आदर्श मध्यमवर्गी परिवार की तरह परिवार का जीवन चलने लगा।
समय के साथ डा0 श्याम ने विकृति विज्ञान में विशेषज्ञता प्राप्त की और उनकी तैनाती पैथालाॅजी विभाग में विभागाध्यक्ष के पद पर हुयी। उनके नेतृतव्त में जनपद की इस पैथालाॅजी में एक नया मुकाम हासिल किया और उन्होने बड़ा नाम कमाया। उनके संज्ञान में डाला गया कि पैथालाॅजी विभाग में कई दलाल सक्रिय हैं। पहले तो उन्होने ध्यान नही नही दिया परन्तु धीरे-धीरे गौर किया तो सच्चाई सामने आने लगी।
विगत वर्षो की छवि के अनुसार पैथालाॅजी में रेप के केस में योनि स्व्राव की स्लाइड नकारात्मक ही दी जाती थी। यह कई जनपदों से फीडबैक प्राप्त करने के बाद पता चला कि यह दस्तूर पूरे राज्य में चल रहा हैं। कोर्ट केस में पेशी से बचने के लिये यही सुरक्षात्मक एवं अवैज्ञानिक तरीका था। संज्ञान में आया कि कोई भी दलाल बलात्कार के केस होते ही महिला चिकित्सालय से ही अभिभावकों के पीछे लग जाते थे एवं अच्छी खासी रकम ऐंठ कर नकारात्मक रिपोर्ट कराने की बात तय हो जाती थी। डा0 श्याम ने देखा कि जैसे ही वे विभाग में प्रवेश करने को होते है। एक अजनबी दलाल उन्हे नमस्कार करता हैं और उसके बाद वह गायब हो जाता हैं। उसके बाद दलाली का बाजार गर्म हो जाता हैं। इस घटना की पुनरावृत्ति रोकने हेतु मैने समाचार पत्रों का अध्ययन बारीकी से किया एवं ऐसी बलात्कारी खबरों एवं दलालों में सम्बन्ध ढूढ़ निकाला। मैने सभी स्लाइडों का बारीकी से अध्ययन एवं परीक्षण करना जारी रखा। कुछ स्लाइडों में मुझे शुक्राणु के होने का अहसास हुआ। तर्को विर्तक की श्रंखला का द्वंद मेरे मस्तिष्क को मथने लगा। इधर न्याय का तराजू उधर दलाली का गैर-कानूनी बाजार । जो नित डा0 श्याम के मान-सम्मान को ठेस पहुचां रहा था। अन्ततः डा0 श्याम पुस्तकों के अध्ययन से एवं अनुभव के आधार पर एवं अपने अवैज्ञानिक तर्को के बन्धन एवं परम्परा को तोड़ने में सफल रहे एवं उन्होने न्याय का साथ दिया। उन्होने स्लाइड में शुक्राणु को पहचाना एवं प्रतिष्ठा दी । जिसे कोर्ट में भी सराहा गया। दलालों की कमर टूट रही थी। उनके अनुमान गलत साबित हो रहे थे। कौन सी नकरात्मक होगी व कौन सी धनात्मक होगी कहना मुश्किल हो गया था। अब डा0 श्याम ने दलाली का व्यापार का खात्मा कर दिया था।
सरकारी दायित्व का निर्वान्ह् इतना सरल नही हेै कि आसानी से निभाया जा सके। इसमे राजनीतिक सामाजिक एवं अपराधिक छवि का दुरूह तिल्सिम भी शामिल हैं। कब आपको राजनैतिक आकाओें के शक से बचाव करना हैं। कब सामाजिक कार्यकर्ताओं के हठ का सामना करना हैं। कब अपराधिक तत्वों के भय से और आंतक से बचाव करना हैं। एवं अपने को स्थापित करना हैं। बुद्धि एवं विवेक की यह उत्कृष्ठ परीक्षा पास करना आसान नही हैं।
अपरान्ह् 1ः00 बजे थे डा0 श्याम अपने कार्यालय के कुछ कार्य में व्यस्त थें। कार्य समाप्त कर वे अपने विभाग वापस पहुचते हैं। अचनाक उनका हृदय धक्क रह जाता हैं। उनके विभाग कक्ष में प्रवेश करते ही उन्हे चारों तरफ से हथियार बन्द लोगो द्वारा घेर लिया जाता हैं। डा0 श्याम ने धैर्य एवं संयम से अपनी कुर्सी सम्भाली एवं आंतक से अन्जान बनते हुये सबका हाल-चाल पूंछा एवं उनके आने का मकसद पूंछा उनमे से एक व्यक्ति जो इनमे हथियार बन्द का नेतृत्व कर रहा था। उसने कहा आपके पास एक महिला की स्लाइड आयी हैं। भावनात्मक ब्लैकमेल की कोशिश करते हुये उसने कहना शुरू किया ।वह एक गरीब महिला है। वह एक व्यक्ति से पीड़ित हैं। जिसने उसका यौन शोषण किया हैं। अब उसे छोड़कर दूसरी महिला से विवाह रचा लिया है। महिला दलित वर्ग की है। एवं आर्थिक रूप से उस व्यक्ति पर निर्भर थी। उस महिला की मदद करने पर डा0 श्याम सहायक हो सके तो बहुत मेहरबानी होगी। उसने आर्थिक लाभ हेतु पन्द्रह हजार रूपये मेज पर रख दिये। एवं संतोष न होने पर अपनी मांग बढ़ाने के लिये कहा। डा0 श्याम ने अपनी कार्यप्रणाली जारी रखते हुये उन्हे बिना बताये उसके सामने ही उक्त महिला की स्लाइड का परीक्षण किया व नकारात्मक पाया। उन्होने तुरन्त रिपोर्ट तैयार की जिसे बाद में बदला न जा सके। वे लोग स्लाइड को धनात्मक करने की हठ कर रहे थे जिससे वह कथित व्यक्ति बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार हो सके।
जिस व्यक्ति ने अपने उसूलों के खातिर अपना जीवन कुर्बान कर दिया उसके सामने दस पन्द्रह हजार की लालच उसका ईमान क्या डिगाती परन्तु उन्हे दो टुग जवाब भी नही दिया जा सकता था। इससे जान को खतरा हो सकता था। अखिर जनपद में अपराधियों का बोलबाला रहा हैं। देश काल एवं परिस्थिति के अनुसार डा0 श्याम ने बात आगे बढायी। उसने जिस वाक चातुर का इस्तेमाल किया। वह बेमिशाल था। उन्होने कहा मित्रों मै आपके फायदे की बात बताता हूॅ। मैने मित्र कहा हैं। अतः सच्चे मित्र की भांति सही राय दूंगा । बलात्कारी बहुत बडा अपराध हैं। महिला को छूना या छेड़ना भी अपराध हैं। यदि प्रतिरोध किया है। उसे चोंट पहुची है तो चिकित्सीय परीक्षण में अवश्य अंकित किया जायेगा । शुक्राणु का पाया जाना यह निश्चित नही करता है। कि रेप हुआ है। जबतक डी0एन0ए0 टेस्ट द्वारा यह पुष्टि न हो जाये कि शुक्राणु उसी व्यक्ति का जिसने बलात्कार किया है।। अतः मेरे पास दबाव बनाने से अच्छा है कि महिला के बयान एवं शारीरिक चोटों को अंकित कराने में जोर दें। एवं डी0एन0ए0 परीक्षण द्वारा पुष्टि कराने हेतु थाने में सम्पर्क करे। इतिहास गवाह हैं, कि बलात्कार के केस में डी0एन0ए0 टेस्ट कभी कभार ही होते थे। परन्तु उस केस के बाद न्याय व्यवस्था में परिवर्तन आया कि डी0एन0ए0 टेस्ट बलात्कार के केस में बराबर होने लगा। एवं स्लाइड के नकरात्मक रिपार्ट का प्रभाव लगभग कम हो गया।
डा0 श्याम के जीवन दर्शन का अध्ययन करने पर उनका आदर्शवाद एक खुली किताब की भांति जाहिर होता हैं। डा0 श्याम ने अपने अनुभव अपने संस्मरण में शामिल किये जिसे लेख में प्रस्तुत किया है।

डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

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