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क्या हिन्दू क्या मुस्लिम यारों

कुमार करन 'मस्ताना'

कुमार करन 'मस्ताना'

कविता

July 17, 2017

क्या हिन्दू,क्या मुस्लिम यारों
ये अपनी नादानी है!
बाँट रहे हो जिस रिश्ते को
वो जानी-पहचानी है!!

क्या पाया है लड़कर कोई
छोड़ ये ज़िद्द लड़ाई की
किस हक से तू चला काटने
सिर ऐ यार खुदाई की
तेरी रगों खून है तो क्या
मेरी रगों में पानी है!
बाँट रहे हो जिस रिश्ते को
वो जानी-पहचानी है!!

हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई
ख़ुद को बाँट रहा है तू
एक शज़र के शाख हैं सारे
जिसको काट रहा है तू
जाति-मज़हब की ये बातें
बनी-बनाई कहानी है!
बाँट रहे हो जिस रिश्ते को
वो जानी-पहचानी है!!

इक मिट्टी हम सब टुकड़े
यह बँटवारा करना छोड़
इब्ने-आदम मैं भी, तू भी
‘करन’ भरम में रहना छोड़
क्या अल्लाह या राम ने सबको
दी कोई निशानी है!
बाँट रहे हो जिस रिश्ते को
वो जानी-पहचानी है!!

Author
कुमार करन 'मस्ताना'
(Poet/Lyricist/Writer) MEMBER OF :- (1) Film Writer's Association, Mumbai. (2) The Poetry Society of India.
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