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काश्मीर का प्रत्युत्तर

अरविन्द दाँगी

अरविन्द दाँगी "विकल"

कविता

April 17, 2017

सारी रात और आधा दिन सोचने के बाद इस कविमन “विकल” ने काश्मीर का एक प्रत्युत्तर सोचा है साहब…
अगर अच्छा लगे कि “अरविन्द” ने देशहित अच्छा लिखा है तो मुझे अपना स्नेहासिष जरूर देना…जिससे मैं अपनी क़लम को और प्रखर कर राष्ट्रनिर्माण में लगा सकूँ…?

काश्मीर का प्रत्युत्तर
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काश्मीर का प्रत्युत्तर कुछ ऐसा मैने सोचा है….
कर खाली पूरी घाटी को वहाँ संसद बनाना सोचा है,
दूतावास सारे दिल्ली से काश्मीर विस्थापन सोचा है,
केंद्र राज्य की सभा का सब हाल वहीं सब सोचा है,
दिल्ली को दे पूर्ण राज्य राजधानी काश्मीर को सोचा है…

जब सारे दल के नेताओ की होगी कक्षा काश्मीर में…
अनचाहे ही सब बोल पड़ेंगे काश्मीर सिर्फ हमारा है,
डर से ही सही हो एकजुट पाक को सबक सिखाना है,
क्या लन्दन क्या अमरीका सबको सिर झुकाना है,
भरी सदन में वन्देमातरम लाहौर तलक गुंजाना है…

बस मोदीजी तुम लालक़िले से कर देना ये घोषणा…
काश्मीर सिरमुकुट भारत का संसद का अब वो पैमाना,
दिल्ली को दिया पूर्ण राज्य बना काश्मीर नया आशियाना,
काश्मीर का ये प्रत्युत्तर सबको चारों खाने चित कर देगा,
हवा निकलेगी देशद्रोह की और पाक चरणों मे होगा…

✍कुछ पंक्तियाँ मेरी कलम से : अरविन्द दाँगी “विकल”

Author
अरविन्द दाँगी
जो बात हो दिल की वो कलम से कहता हूँ.... गर हो कोई ख़ामोशी...वो कलम से कहता हूँ... ✍अरविन्द दाँगी "विकल"
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